<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287</id><updated>2011-11-28T05:07:34.973+05:30</updated><title type='text'>Funda-Today</title><subtitle type='html'>Managment Funda of the Day</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://funda-today.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>29</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-8871048118628917299</id><published>2008-03-24T23:43:00.005+05:30</published><updated>2008-03-25T11:30:47.042+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;गुस्से कि नुमाइश से बचें&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;न्युओर्क निवासी डेविड जे पोलाय का कहना हैं कि जीवन जीने कि कला उन्होने एक टेक्सी ड्राइवर से सीखी हैं। बात तकरीबन सोलह साल पुरानी हैं जब वे टेक्सी से ग्रांड सेन्ट्रल स्टेशन कि तरफ रवाना हुए । वाहन पहुँचने के बाद पार्किंग कि खाली जगह पर जैसे ही टेक्सी ड्राइवर ने टेक्सी पार्क करनी चाही कि तभी एक काली काली कार तेजी से आकर टेक्सी के सामने आकर खड़ी हो गई। टेक्सी ड्राइवर ने तेजी से ब्रेक लगाया और टेक्सी घिसटते हुए कार से १ इंच कि दुरी पर रुक गई। उसके बाद क्या हुआ? दूसरी कार के चालक ने खिड़की से अपना मुह बाहर निकाला और मुड़कर टेक्सी ड्राइवर को गलिया देना शुरू कर &lt;span class=""&gt;दी &lt;/span&gt;। टेक्सी ड्राइवर ने मुस्कराते हुए उसका अभिवादन किया। यह सब देख राहे डेविड ने उससे पूछा, आपने ऐसा कुयों किया वो आदमी तुम्हारी टेक्सी को ठोंक देता और हमे अस्पताल पंहुचा सकता था। टेक्सी ड्राइवर ने जवाब दिया - में उसे क्या कहता , वो बेचारा परेशानियों से घिरा हुआ था। बहोत से लोग ऐसी परिस्थतियों से घिरे हुए हैं वे लोग ज़माने भार कि परेशानियाँ , निराशा, गुस्सा और हताशा सिर पर लेकर घूमते हैं। जब उनका गुस्सा सिर से ऊपर हो जाता हैं तब वे उसे उड़ेलने के लिए जगह ढून्ड्नें लगते हैं। और जब आप उनके सामने पड़ गए तो वो अप पर ही सारा कुछ उडेल देते हैं । &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;जब कोई आपसे इस तरह पेश आये तो आप इस अपने दिल पर न लें । आप मुस्कुराकर, उसका अभिवादन कारकार आगे बढ़ जाएं । आप खुद को खुश पाएंगे, ये मेंरा दावा हैं, उस ड्राइवर ने जवाब दिया। अक्सर हम भी इसी तरह कि परेशानियाँ अपने सिर पर लेकर चलते हैं। और किसी का गुस्सा किसी पर निकालते हैं। घर-में, दफ्तर या रास्ते पर चलते -फिरते लोगों पर ? उस दिन के बाद डेविड ने प्रण किया कि वे आगे से किसी के साथ भी इस तरह पेश नहीं आयेंगे। कई बार मेने भी ऐसी परिस्थतियों का सामना किया हैं । लोग गुस्स्से से भरे हुए हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वे लोग अपनी चिड़ उतारना चाहते हैं। टेक्सी ड्राइवर कि बात को ध्यान में रखकर मेने उन वाक्यों को प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया। मैंने उमुस्कुराकर उनका अभिवादन किया और शुक्रिया कहकर विदा हो गया। अछे अभिभावक जानते हैं कि स्कूल से लौटे बच्चों से किस तरह लाड और प्यार करना चाहिऐ। वरिष्ठ अधिकारी और अभिभावक अपने अधिनास्थों का पुरा ख्याल रखें। और उनके हित के बारे में सोचें।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फंडा यह हैं कि महान व्यक्ति कभी भी अपने गुस्से की नुमाइश नहीं करते। आप क्या सोचते हैं? क्यों न आज से ही आप इस मूल मन्त्र का अनुसरण करें । यदि आपका भी व्यक्तित्व इसी तरह का हैं तो खुद को बदल डालिए । में दावा करता हूँ कि आप खुश रहेंगे , ये मेरा दावा हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-8871048118628917299?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/8871048118628917299'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/8871048118628917299'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_24.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-8216864650553886965</id><published>2008-03-23T13:25:00.003+05:30</published><updated>2008-03-23T13:46:31.501+05:30</updated><title type='text'>आज के मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;लीडर और टीचर एक सिक्के के दो पहलू हैं&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;आज के दौर में एक लीडर को अपना अस्तित्व बनाये रखेने के लिए एक टीचर का रोल अदा करने के बजाये दूसरा विकल्प नहीं बचा हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;किसी भी प्रोफेशन में एक अच्छा टीचर ही अच्छा लीडर हो सकता हैं। ये सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं। हम एक ऐसे युग में जी रहें हैं जिमें मेनेजर शब्द विदा  हो गया हैं और उसकी जगह लीडर ने ले ली हैं। ऐसे परिद्रश्य में एक लीडर के लिए ज्ञान प्रदान करना महत्वपूर्ण हो गया हैं। लीडर ही अपनी टीम की कार्यप्रणाली, कौशल और नेतृत्व संबंधी नवीनतम प्रवात्तियों का विकास करता हैं और  उसे प्रेरित करता हैं।   बल्कि इससे स्वयम भी कुछ नया सीखता हैं। सच तो यह हैं कि हर मानव में नेतृत्व संबंधी प्राकृतिक गुण होते हैं। लेकिन ये हम पर निर्भर करता हैं कि इस गुण को हैं कैसे विक्सित करते हैं। टीचर के रूप में एक  व्यक्ति अपनी टीम के और करीब आता हैं। संवादहीन दूरी को पाटने में  कामयाब होता हैं। वफादारी हासिल करता हैं।   सवाल जवाब के माध्यम से समस्याओं का समाधान होता हैं।   और टीमवर्क में इससे बड़ी मदत मिलती हैं। इससे हर सदस्य चिंतन-प्रक्रिया और सामुहिक वार्ता में सक्रीय रूप से भाग लेता हैं। प्रतिक्रिया देने और प्रतिघात करने का समय अब नहीं रहा। अब सकारात्मक दूरदर्शी सोच और व्यवहार कार्पोरेट ओफिसों के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा हैं।    इसलिए इस मामले में आगे बने रहेने के लिए लीडर को चाहिऐ की वह अपनी टीम के प्रत्येक सदस्य को लगातार नया पाठ सिखाये और प्रशिक्षित करे। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;फंडा यह हैं की एक लीडर के समक्ष अपना अस्तित्व&lt;/span&gt; बनाये रखने के लिए एक टीचर का रोल अदा करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं बचा हैं   &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-8216864650553886965?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/8216864650553886965'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/8216864650553886965'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_23.html' title='आज के मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-6505066575939048729</id><published>2008-03-22T23:27:00.005+05:30</published><updated>2008-03-23T13:23:50.410+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;संवाद से बनती हैं बात&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;वार्तालाप के ज़रिये आप अपनी बात दूसरों तक आसानी से पंहुचा सकते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;इससे ही आपकी उपलब्धियों के लिए नया मार्ग मिलेगा। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;भारत और चीन के बीच हुआ १९६२ का उद्ध समाप्त ही हुआ था और पुरा देश अपने बेशकीमती सैनिक खोने और राजकीय सम्मान गवाने के शोक में डूब गया था। इसी समय प्रसिद्द फिल्म निर्देशक चेतन आनंद मुम्बई-मद्रास की रेल यात्रा कर राहे थे। उनके पास बैठे यात्री ने उनसे बातचीत शुरू कि। यह आदमी और कोई नहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नहरू के सबसे ताकतवर सचिव ओपी मथाई। जब मथाई को पता चला कि चेतन फिल्म निर्देशक हैं तो उन्होने फिल्म इंडस्ट्री को यह कहते खरी खोटी सुननी शुरू कर दी कि वाहन निरर्थक फिल्में बनी चली जा रही हैं और देश के वास्तविक मुद्दों पर उसका ध्यान नहीं हैं। हमेशा से विनम्रता की प्रतिमूर्ति रहे चेतन आनंद ने उनसे फिल्म के लिए विषय सुझाने को कहा। मथाई ने तत्काल उन्हें चीन के साथ हुए युद्ध अनुभवों पर आधारित फिल्म बनाने की बात कही। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;आनंद ने कहा कि इतन&lt;/span&gt;ए बड़े पैमाने की फिल्म सरकार की सहयोग और मदत के बिना संभव नहीं हैं। मथाई ने उनकी समस्या समझी और उन्हें दिल्ली आमंत्रित कर समाधान के सिलसिले में प्रधानमंत्री से मिलवाने का वादा किया। चेतन आनंद को शुरू से पंडितजी से मिलने की तमन्ना थी जो, तब तक पूरी नहीं हो पाई थी। निर्धारित तारीख़ को मथाई ने चेतन की मुलाकात प्रधानमंत्री से करवाई। पंडित जी ने चेतन के युद्ध आधारित फिल्म बनाने के प्रस्ताव कि सराहना की। उन्होने तत्काल सेना प्रमुख को बुलाया और उन्हें सारी ज़रूरी मदत उपलब्ध करने का आदेश दिया।  और इसके बढ़ जो कुछ हुआ वो इतिहास के प्रस्थों मै स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। पहली युद्ध फिल्म 'हकीकत' बनी और हिट साबित हुई ।  &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;फंडा यह हैं कि थोडा सा संवाद आपको कहाँ से कहाँ पंहुचा सकता हैं।  &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-6505066575939048729?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/6505066575939048729'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/6505066575939048729'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_22.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-718357724035246579</id><published>2008-03-21T23:55:00.002+05:30</published><updated>2008-03-23T13:25:45.953+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;नाम की गफलत से बचें&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कर्मचारियों के एक जैसे नाम स्टाफ के बीच समस्या पैदा कर सकते हैं। खास मौकों पर कम्पनी के एचआर विभाग को कर्मचारियों के नाम को लेकर गफलत से निपटना चाहिए&lt;br /&gt;सेरिडोन टैबलेट बनाने वाली कंपनी रोष प्रोडक्ट लि को एक समय एक विचित्र किस्म की समस्या से दो चार होना पड़ रहा था। इस कंपनी के महाप्रबंधक का नाम डाक्टर काशीनाथ कॉल था। सीरप विभाग में भी इसी से मिलते जुलते नाम वाला एक ओपरेटर, काशी विश्वनाथन था। कॉल एक कश्मीरी थे और कामकाज के मामले में काफी सख्त थे। इसके अलावा निर्माण प्रक्रिया के बरे में वह गहरी जानकारी रखते थे। उन्हें सीरप में महारत हासिल थी। उनके साथ समस्या यह थी की वे जब भी उस विभाग में राउंड लगाने जाते थे, तो दुसरे वर्कर विश्वनाथन को कशी कहकर पुकारने लगते थे, जो डाक्टर कॉल का शुरुआती और संक्षिप्त नाम था। इससे बचने के लिए एचआर विभाग ने सबसे पहले डाक्टर कॉल का नाम बदल दीया। उन्हें तत्काल प्रभाव से डाक्टर के एन कॉल कहकर सम्भोदित किया जाने लगा। वे इसी नाम से कागजों पर हस्ताक्षर करने लगे। सभी वरिष्टों को उन्हें नये नाम से पुकारने के लिए कहा गया।&lt;br /&gt;हाल ही में में ग्लोबल इन्वेस्टर मीट के दौरान इंदौर में था। वाहन मेरी मुलाकात टाटा टी के अकाउंट मैनेजर कृष्ण अय्यर से हुई। संयोग से अय्यर का नाम टाटा टी के उपद्यक्ष कृष्ण कुमार से मिलता-जुलता हैं। में अय्यर से इस बारे में पूछा के वे इस समानता से पैदा हुई गफलत से कैसे बचते हैं? अय्यर नें बड़ी सता से बताया की हर कोई मुझे अय्यर कहता हैं ओर उपाध्यक्ष को उनके सम्कक्षी कृष्णा कहकर बुलाते हैं।&lt;br /&gt;फंडा यह हैं की खास मौकों पर कम्पनी के एच आर विभाग को कर्मचारियों के नाम को लेकर गफ्लातों से निपटना चाहिऐ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-718357724035246579?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/718357724035246579'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/718357724035246579'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_21.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-6335261006908643719</id><published>2008-03-20T10:30:00.002+05:30</published><updated>2008-03-20T10:37:53.086+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div style="color: rgb(153, 153, 0);" align="center"&gt;&lt;strong&gt;खुद को सवालों के जाल में ना उलझाएँ&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अमेरिका में एक शहर की अदालत में मुकदमा चल रहा था। अभियोजन पक्ष के वकील ने अपने पहले गवाह को कठघरे में बुलाया। यह गवाह एक बुजुर्ग महिला थी। वकील गवाह के करीब गया और पूछा- श्रीमती जोन्स, क्या आप मुझे जानती हैं ? इस पर बुजुर्ग महिला ने कहा- क्यों नहीं, मैं तुम्हे अच्छी तरह जानती हूँ। मैं तुम्हे तब से जानती हूँ, जब आप एक लड़के थे। सच कहूँ तो तुमने मुझे बहोत निराश किया है। तुम झूठे, मक्कार और धोकेबाज़ हो। तुमने अपनी बीवी से बेवफाई की है। तुम लोगों के साथ सिर्फ अपना मतलब निकालते हो और महाचुगल्खोर हो। तुम अपने को बड़ा तीसमारखाँ समझते हो, मगर तुम्हारी हैसियत एक मामूली क्लर्क की भी नहीं है। तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा हुआ है। वकील को काटो तो खून नहीं। उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि क्या किया जाये ? उसने अदालत कक्ष के दूसरे सिरे की ओर इशारा करते हुए पूछा- क्या आप बचाव पक्ष के वकील को जानती हैं ? उस महिला ने जवाब दिया बेशक। मैं मिस्टर ब्रैडली को जब वह एक छोकरा था, तब से जानती हूँ। वह महा सुस्त, धर्मांध और पियक्कड़ है। उसकी किसी से नहीं पटती। पट भी नहीं सकती। पूरे राज्य में उस जैसा बेकार वकील मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा, इस बात कि चर्चा करनी ही फिजूल है, कि इसने तीन-तीन महिलाओं के साथ गुलछर्रे उड़ाए और इस तरह अपनी बीवी को बेचारगी और लाचारी की हालत में छोड़ दिया। जिन महिलाओं के साथ इसने नाजायज़ संबंध जोड़े, उनमे से एक तुम्हारी बीवी थी। बचाव पक्ष का वकील तो यह सब सुनकर करीब-करीब मर ही गया। आखिरकार जज ने दोनों वकीलों को अपने पास बुलाया। उसने दोनों के कानों में फुसफुसाते हुए, मगर बेहद गुस्सैल अंदाज़ में कहा- तुम दोगले वकीलों में से किसी ने अगर उस महिला से पूछा कि क्या वो मुझे जानती है, तो मैं तुम दोनों को अदालत की मानहानी के आरोप में जेल में डाल दूंगा।&lt;br /&gt;बहरहाल, किसी कंपनी के संदर्भ में यहाँ फंडा यही है कि बोर्ड रूम कि बैठक में अपने स्टाफ से ऐसा सवाल न करें जिससे आप मुसीबत में फंस जाएँ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-6335261006908643719?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/6335261006908643719'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/6335261006908643719'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_20.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-4679791051929223847</id><published>2008-03-19T22:24:00.002+05:30</published><updated>2008-03-20T10:33:55.525+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 102, 51);"&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 153, 0);"&gt;मूल आधार की कभी उपेक्षा न कर&lt;/span&gt;ें&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अक्सर हम लोगों को चेहरे और हाथों पर क्रीम लगते, बालों को डाई करते और तमाम तरह के सौन्दर्य-प्रसाधन स्तेमाल करते देखते हैं । अच्छा दिखने की चाहत रखना कोई गलत बात नहीं हो सकती। यहाँ पर आपका ध्यान में इस बात की और लाना चाहता हूँ, कि मनमोहक दिखने की इस तमन्ना के बीच हममें से कितने हैं, जो अपने पाँव के अंगूठों के नाखूनों की सफ़ाई भी उसी हसरत के साथ करते हैं, जैसे की चेहरे और बालों की देखभाल? एसे लोगों की संख्या बहुत कम है। हममें से इसे कितने लोग है, जो अपने पैरों की मसाज वैसे ही करते है, जैसे की पार्लर में अपने सिर या चहरे की करवाते हैं इनकी संख्या भी बहुत नहीं है। ( लेख़क कभी ब्यूटी पार्लर नहीं गया)&lt;br /&gt;ज़रा पैरों की ओर देखें। आप जैसे-जैसे बड़ते है, आपके शरीर का भार आपके पैरों पर बढता है और वह इसे वहन करता जाता है। जीवन की गतिविधियों के अनुसार ये पैर टहलते, दौड़ते आपकी ज़रूरतों को पूरा करते है। ऐसा कितनी बार हुआ है की आपने अपने पैरों की वाहवाही की है। उनकी पीठ थपथपाई है, उनकी मान मनुहार की है। उनकी प्रशंसा करते हुए कहा है की आज तुमने १४ घंटे काम करने में मेरा साथ दिया और नमकयुक्त गरम पानी से स्नान कराकर उनको रहत प्रदान की है। इसके विपरीत आप जितनी बार भी शेव करते है, तो चेहरे पर क्रीम और लोशन लगाकर चेहरे को सुकून देने की कोई कोर कसर नहीं बाक़ी नहीं रखते। जब भी पेरों की बात आती है तो शरीर का पूरा भार उठाने के बाद भी, जाने या अनजाने ही, हम इनके साथ सोतेला व्यवहार करते है अगर इसी फलसफे को कार्पोरेट लाइफ में लागू करें तो आप यहाँ पर पेरों की तरह ही कर्मठ कर्मचारियों की उपेछा ओर अवहेलना होती पायेगें उनके योगदान को हल्के में लिया जाता है और वे अपने आपको समझा लेते है की आखिरकार वे मेहनती है ओर वेसे ही मेहनत करते रहेगें, क्योकि ये समर्पित कर्मचारी जो हैं। फंडा ये है की देखभाल पूरे शरीर की सेहत के लिय दूरगामी असर डालती है, उसी तरह परिश्रमी कर्मचारियों का खयाल रखना चाहिए, ये ही हमारे ओर किसी भी कम्पनी के मूल आधार है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-4679791051929223847?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/4679791051929223847'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/4679791051929223847'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_19.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-8848896123840006347</id><published>2008-03-18T23:53:00.001+05:30</published><updated>2008-03-20T10:35:05.950+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;p style="color: rgb(153, 153, 0);" align="center"&gt;&lt;strong&gt;सब कुछ बिकता है&lt;br /&gt;अगर आपके पास बिस्नस माइंड हो, तो कचरे जैसी चीस के भी खरीदार मिल जाते हैं।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;कई अवसरों पर जो चीस हमारे लिए कचरा होती हो वही किसी दुसरे के लिए कच्चा माल हो जाती है। दूरदर्शी व्यवसाई आमतोर पर फैक्ट्रियों और उद्योगों से निकले इस तरह के अपसिष्टों का अधिकतम लाभ उठाने की कोशिश करते हैं। इसका उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है:- गैस की भारी किल्लत झेल रहे भारत को ओमान सरकार से ओद्योगिक कोयले से गैस एक्स्चेंग का प्रस्ताव मिला है। भारतीय ओद्योगिक कोयले की गुढ़वत्ता कोई खास अच्छी नहीं होती है और इसमे राख की भारी मात्रा मौजूद होती है, इसके बाद भी ओमान सरकार इसको क्यों पाना चाहती है ? इसका एक बेहद ही रोचक जवाब है।गौरतलब है की हमारे कोयले मै राख का ऊँचा स्तर उर्जा उत्पादन में अच्छा नहीं माना जाता, लेकिन ओमान सरकार को उर्जा उत्पादन के लिए कोयला चाहिऐ ही नहीं। उर्जा के लिए वो तेल का उत्पादन करती है। दरअसल उच्च राख वाला कोयला व्यापक परिमाण में सीमेंट के उत्पादन मै महती भूमिका निभाता है। यही वजह है कि ओमान सरकार खराब कोयले के बदले हमे गैस देने के लिए बहुत उत्सुकता दिखा रही है। निश्चित रूप से ये दोनों सरकारों के लिए लाभ ही लाभ का सौदा है। सच्चाई तोये है की ओमान में कंस्ट्रक्शन ओद्योग का बाजार गरमाया हुआ है। ओमान ही क्यों दुबई और आस पास के बाजार भी इस द्रष्टि से काफी महत्वपूर्ण हो गए हैं। भवन निर्माण संबंधी उपकर्णो का विश्व का एक-तिहाई हिस्सा खाड़ी देशों मै स्थित है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं अगर ओमान हमारे निम्न्कोटी के कोयले में इतनी रूचि दर्शा रहा है। फंडा यह है की अगर आपके पास बिस्नस माइंड हो तो कचरे जैसी नाचीज़ के खरीदार भी मिल जाते हैं।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-8848896123840006347?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/8848896123840006347'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/8848896123840006347'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_18.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-5795417272261857290</id><published>2008-03-17T23:26:00.002+05:30</published><updated>2008-03-20T10:40:07.113+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 153, 0);"&gt;&lt;strong&gt;सेवा क्षेत्र हमेशा फलता-फूलता रहेगा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;शिक्षा और ज्ञान के प्रसार का स्तर ऊँचा उठने की संभावना के रहते सेवाओं की मांग में कभी कमी नहीं होगी।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;महज़ १० साल पहले ऐसा प्रतीत होने लगा था की आने वाले समय में बनिक शाखाओं की कोई ज़रूरत नहीं रह जायेगी। इस तरह की कपोल-कल्पनाएं की जाने लगी थीं की आँटोमेटड टेलर मशीन (एटीएम) आँनलाइन बैंकिंग और टेलीफोन कोल-सेंटर ग्राहकों की बैंक शाखाओं पर निर्भरता कम कर देंगे। इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में एक लाख से अधिक एटीएम खोले गए और बैंक सोचने लगे थे की शाखाओं में कामकाज का समय घटाना पड़ जायेगा, लेकिन इस संभावना के शीघ्र ही पंख उखड़ गए। हुआ ठीक उल्टा, प्रत्येक शहर में बैंकों को एक-पर-एक नई शाखाएँ खोलनी पड़ी। यही नहीं इन बैंकों में कामकाज का समय भी ६ घंटों से बढ़कर १२ घंटे जा पहुंचा।&lt;br /&gt;इसके बावजूद हर कोई अपनी खुली आंखों से कई अवसरों पर बैंकों के बाहर और दोनों तरफ लम्बी लम्बी सर्पीली कतारों का नज़ारा देख सकता है। इसमें दो राय नहीं की दुनिया की किसी भी उन्नतिशील अर्थ व्यवस्था में सेवा-क्षेत्र का निरंतर विकास और विस्तार होता ही रहेगा। जैसे-जैसे और जब-जब शिक्षा स्तर ऊँचा उठेगा तो आबादी में विभिन्न तरह की सेवाओं का इस्तेमाल करने की चाहत पैदा होगी। बैंकिंग सेवा का इस्तेमाल तोग सिर्फ इसलिए नहीं करेंगे की उनके पास खाते में रखने के लिए कितना पैसा है, बल्कि मानव की बचत करने की मूल-प्रवत्ति की वजह से भी। यहाँ तक की एसे लोग भी इस सेवा का लाभ उठाने की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं, जिनको मुश्किल से दो जून की रोटी नसीब हो पाती है। फंडा यह है की समाज में शिक्षा और ज्ञान के प्रसार का स्तर ऊँचा उठाने की सम्भावना जब तक बनी रहेगी सेवाओं की मांग में कभी कमी नहीं होगी।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-5795417272261857290?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/5795417272261857290'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/5795417272261857290'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_17.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-9167569604590608244</id><published>2008-03-16T23:34:00.002+05:30</published><updated>2008-03-20T10:41:32.806+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 153, 0);"&gt;&lt;strong&gt;बिजनेस के अवसरों की कोई कमी नहीं&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;यदि आप अपनी आँखें और कान खुले रखें और अवसरों की तलाश करें तो पाएंगे की इनकी कोई कमी नहीं  है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अधिकतर कामकाजी माहिलाओं को घरेलू कामकाज, नोकरी और बच्चों के प्रति जिमेदारियों के बीच तालमेल बैठाने में काफी मशक्कत करनी पडती है। इन्हीं हालात को ध्यान में रखते हुए 'कंगारू किड्स ' नामक प्ले स्कूल ने मुम्बई के एक मॉल में डे-केयर सेंटर खोला है, यह बच्चों की चिल्ल-पों और हुदादंग्बजी और अन्य दूसरे बाहरी कारकों से बगैर किसी बाधा के शापिंग करने और फिल्म देखने की ख्वाहिश रखने वाले पैरेंट्स के लिए तैयार किया गया है। इस प्ले-स्कूल में प्री-स्कूल गतिविधिया, पारस्परिक क्रियाकलाप के इंतजाम के साथ-साथ बच्चों को ड्राइंग और मिट्टी के खिलोने बनाने की सुबिधाएं भी है। यदी आप इन सेवाओं को गोर से देखें तो यह बात समझ में आती है की मुम्बई जैसे महानगर में बच्चों के लिए क्रेश (पालानाघर ) जैसी सुविधाएं है, जिनकी पैरेंट्स पूरे माह सेवाएं लेते है या कहें की लेती है, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी है, जिनको कभी-कभार जैसे घंटें-दो घंटें के लिए या एक दिन के लिए ही इनकी जरूरत होती है, तो उन्हें अपने बच्चो के लिए ऐसी कोई सर्विस का कोई विकल्प मोजूद नहीं दिखता। लेकिन अब प्ले-स्कूल सेंटर के आने से सिनेमा जाने वाले, साप्ताहिक किराना की खरीदारी करने वाले, किसी को हवाई अड्डे या स्टेशन जैसी भीड़-भाड़ वाली जगह पर विदाई देने जाने वाले लोग इनकी सेवाएं लेने लगे हैं , ये सेंटर कामकाजी अभिभावकों और यहाँ तक की एकल परिवारों के लिए वरदान साबित हुए है। जिस तरीके का आर्थिक उदारीकरण अपने पांव पसार रहा है और प्ले-स्कूल जैसे बिजनेस के अनगिनत रूप और अवसर उपलब्ध हुए है, उसे देखते हुए कोन कह सकता है की बिजनेस के अवसर सिकुड़ रहे है?&lt;br /&gt;फंडा यह है की यदि आप अपनी आखें और कान खुलें रखें   और अवसरों की तलाश करें तो पाएंगे की इनकी कहीं कोई  कमी नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-9167569604590608244?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/9167569604590608244'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/9167569604590608244'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_16.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-4360359893965003133</id><published>2008-03-15T23:56:00.001+05:30</published><updated>2008-03-20T10:48:10.047+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div style="color: rgb(153, 153, 0);" align="center"&gt;&lt;strong&gt;बाज़ार की मांग के अनुसार चलें&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ज्ञान यानी विद्या की तलाश और पढ़ाई का परंपरागत रूप से व्यावहारिक दुनिया से नाता नहीं रहा हैं। आजकल समूचा ज्ञान तर्कशास्त्रीय होता जा रहा हैं और इसी रूप में इनका शिक्षण-कार्य भी हो रहा हैं। डिग्री, विशेषज्ञता और उच्च शिक्षा विषय-विशेष केंद्रित होकर रह गई हैं। ज्ञान की सम्पूर्ण बातें हमें एक उत्पाद की तरह परोसी जा रही हैं, न की बाज़ार की जरूरतों को ध्यान में रखकर या कहें की वास्तविक उपयोगकर्ता की जरूरत को समझकर। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आखिरकार विद्या बाँटने वाले इस मुख्य समस्या को धीरे-धीरे समझने लगे हैं और कई तरीकों से इनमें संशोधन की कोशिश भी करने लगे हैं। कुछ खास क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बदलावों के बावजूद बड़ी संख्या में ज्ञान बाँटने वाले पुरानी शिक्षण-पद्धति का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हैं की एक तरफ़ तो बड़ी संख्या में स्नातकों को नौकरी पाना मुश्किल हो रहा हैं, वहीं दुसरी तरफ़ नियोक्ताओं को प्रशिक्षित कर्मचारी ढूंढे नहीं मिला रहे हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हालांकि कुछ स्कूल-कोलेजों में नवीन तौर तरीकों के ज़रिये व्यावहारिक ज्ञान प्रदान किया जाने लगा हैं। महत्वपूर्ण बात यह हैं की इस ज्ञान को युवा पीढ़ी को लेने की सबसे बड़ी ज़रूरत आन पड़ी हैं। युवाओं को पहले यह तय करना होगा की वे आने वाले १० सालों में क्या करना चाहते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इसी के मुताबिक उस विषय के विशेषज्ञ से ज्ञान हासिल करने की कोशिश करें। फंडा यह हैं की अगर शिक्षण संस्थानों में बाज़ार की मांग के मुताबिक पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण विषय लागु किए जा रहे हैं तो नई पीड़ी को चाहिए की इस बदलाव के अनुसार डिग्रियाँ , प्रशिक्षण और योग्यता हासिल करें , तभी वह अपने कैरियर को मनोवांछित ऊँचाई पर ले जाने में कामयाब है सकेगी। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-4360359893965003133?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/4360359893965003133'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/4360359893965003133'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_15.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-255977911827517537</id><published>2008-03-14T23:57:00.001+05:30</published><updated>2008-03-20T10:46:43.440+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 0);"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 153, 0);"&gt;अच्छी कमाई के लिए विशेषज्ञता हासिल करें&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="display: block;" id="formatbar_Buttons"&gt;&lt;span class="" style="display: block;" id="formatbar_JustifyFull" title="Justify Full" onmouseover="ButtonHoverOn(this);" onmouseout="ButtonHoverOff(this);" onmouseup="" onmousedown="CheckFormatting(event);FormatbarButton('richeditorframe', this, 13);ButtonMouseDown(this);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 153, 153);"&gt;&lt;em&gt;आप कितने समय मै कितना पैसा कमाना चाहते हैं, इसका फैसला आपको खुद करते हुए उसी के मुताबिक अपने आपको तैयार करना होगा। &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 153, 153);"&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;दो पौधे आपस में बातें कर रहे थे। पहला दुसरे से कहता हैं की तुम बहुत टेढे-मेडे और इतने छितर- बितर होकर फ़ैल रहे है की देखने मै काफी भद्दे नज़र आते है? मुझे देखो, में बिलकुल सीधा ऊपर की तरफ बढ़ रहा हूँ और तुमसे बाधा भी हूँ। में कितना सुन्दर भी दिखता हूँ। दुसरे पौधे कहा:- तुम जितना सीधे होकर बधोगे और सुन्दर दिखोगे अपने लिए उतनी ही जल्दी मुसीबत लाओगे। मानुषों की इस निर्दयी और मक्कार दुनिया में तुम लम्बे समय तक जिंदा नहीं रह पाओगे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;पहले पौधे ने कहा:- मझे इसकी परवाह नहीं हैं। जो आदमी मेरी जड़ों मै रोज़ पानी देता हैं, में उसके प्रती वफादार बना रहना चाहता हूँ। यही वजह हैं की में बिलकुल सीता बढ़ते रहना चाहता हूँ। इस तरह कई बरस बीत गए। दोनों पौधे एक पूर्ण वृक्ष के रूप में विकसित है गए। अचानक एक दिन वह आया की जो सीधे वृक्ष को पानी दीया करता था, उसे काटने की लिए मार्क कर गया। एक दिन उसकी कटाई भी शुरू है गई। उसे काटकर बाजार मै बेचा जाना था। जिससे फर्निचर आदि बनाये जाने के कारन उसकी कीमत भी अच्छी मिलनी थी। कटे जाते समय सीधे वृक्ष ने टेढे-मेढे वृक्ष से कहा- हाँ, तुमने ठीक कहा था। उसने माना की किसी को हमेशा सीधा नहीं होना चाहिए यह कहते हुए उसने दम तोड़ दिया टेढे-मेधे वृक्ष कुछ बरस तक और जिंदा रहा, लेकिन एक दिन उसके भी काटने की बारेe आई, क्योंकि कागज़ निर्माण के लिए उसकी लुगदी बनाईं जानी थी और जलान्ने में भी उपयोग किया जाना था। आप इस कहानी को आम ज़िंदगी से जोड़कर देख सकते हैं। व्स्से दो भिन्न स्थातियाँ नज़र आती हैं :-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;१ यादे आप केवल एक तरह का जब करने की क्षमता रखते हैं, टू आपकी केरियर लाइफ छोटी होने के साथ एक सीधी रेखा में चलते हुए समाप्त है जाती हैं। अगर आप कई तरह का काम करने की क्षमता रखते हैं टू आपकी कैरियर लाइफ लम्बी चलती हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;२ अगर आप किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता रखते हैं टू आपको कैरियर बाज़ार में ऊँची कीमत मिलती हैं। यदि आप काम टू कई तरह का करना जानते हैं, लेकिन विशेषज्ञता किसी में नहीं हैं टू आपकी कैरियर लाइफ लम्बी ज़रूर है सकती हैं, मगर जॉब मार्केट में उसकी ऊँची कीमत नहीं मिलती। इन दोनों में से किस सत्ती में आप स्वयम को देखना चाहते हैं, यह ख़ुद आप पर निर्भर करता हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;फंडा यह हैं की आप कितने समय में कितना पैसा कमाना चाहते हैं, इसका फ़ैसला आपको ख़ुद करते हुए उसी के मुताबिक अपने आपको तैयार करना होगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-255977911827517537?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/255977911827517537'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/255977911827517537'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_14.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-143929160450832239</id><published>2008-03-13T00:53:00.002+05:30</published><updated>2008-03-13T02:12:33.177+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;चुनौतीपूर्ण परिस्थाती में संतुलन बनाये रखें।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हाल ही में मुझे स्वास्थ्य गुरु विजय बत्रा से मिलने का मौका मिला उनहोंने एक कहानी सुनाई। उस कहानी का सार यह हैं की एक दिन संजय नामक एक व्यक्ति को इंटरव्यू के लिए जाना था। जहाँ पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर नौकरी मिलती थी। संजय ने खुद को इसके लिए तैयार किया। वह इंटरव्यू के लिए निर्धारित समय से ४५ मिनट पहले ही वाहाँ पहुंच गया, जहाँ पहले से ही ३० लोग लाइन लगाये इंटरव्यू देने के लिए खड़े थे। उसे पक्का विश्वास हो गया की उसका नंबर आने से पहले ही यदि कोई सही उम्मीदवार साक्षात्कार लेने वाले व्यक्तियों को मिला गया तो फिर नौकरी उसके हाथ से जाती रहेगी। संजय ने एक आश्चर्यजनक तरकीब निकली। उनहोंने एक छोटे से कागज़ पर लिख भेजा - 'मेरा नाम संजय हैं। मैं लाइन में ३१ वें नंबर पर इंटरव्यू के लिए खडा हूँ । आपसे आग्रह हैं की आप जब तक मेरा इंटरव्यू न ले लें, तब तक किसी उम्मीदवार का चयन ना करें।&lt;br /&gt;इंटरव्यू पैनल ने संजय के इस कदम की सराहना की और इस तरह उसे वह नौकरी मिल गई। कई बार हमें भी चुनौतीपूर्ण स्थतियों का सामना करना पड़ता हैं, लेकिन तब सबसे बड़ी चुनौती यह होती हैं की उन परिस्थतियों में हम अपने दीमाग को कैसे संतुलित रखें और सोचें की ऐसा क्या करें की अवसर का लाभ हमें प्राप्त हो।&lt;br /&gt;फंडा यह हैं की हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होती हैं की विपरीत परिस्थतियों में हम कैसे अपने आप को शांत और मर्यादित रखें। यदी हर कोई विपरीत परिस्थतियों में धैर्यपूर्वक गहरे से सोचे तो वह उसका हल निकाल सकता हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-143929160450832239?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/143929160450832239'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/143929160450832239'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_9838.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-340560091292180419</id><published>2008-03-12T20:56:00.000+05:30</published><updated>2008-03-12T20:57:59.247+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;सेवाओं में कोताही ना बरतें&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पिछले माह सप्ताहांत में खंडवा, मध्यप्रदेश से मुम्बई की ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे की यात्रा कर रहा था। यहाँ पर प्रथम श्रेणी के डिब्बे का ज़िक्र खास मकसद के लिए किया गया हैं न कि आप पर ऐसा रुतबा झाड़ने के लिए कि में प्रथम श्रेणी में यात्रा करता हूँ। इसका ज़िक्र करने का मतलब आपको यह बताना था कि प्रथम श्रेणी का रेल किराया करीब करीब एक सामान्य विमान किराए के बराबर हैं। कई बार तो फर्स्ट एसी ट्रेन के यात्री किराये से विमान का किराया सस्ता होता हैं। चूँकि ट्रेन चार घंटे लेट थी तो मेने इस मौके का इस्तेमाल ट्रेन के इस प्रथम श्रेणी के डिब्बों में प्रीमियम श्रेणी के यात्रियों को मुहैया कराये जाने वाली सुविधाओं का जायजा लेने में किया। इस दौरान सबसे पहले मेरी नज़र यात्रियों को उपलब्ध कराये जाने वाली टी-ट्रे पर गई। इस टी-ट्रे के साथ पेपर कोस्टर पर भारतीय रेल का मिशन स्टेटमेंट दर्ज था, जिससे यह ज़ाहिर होता था कि भारतीय रेल किस तरह यात्रियों को उनके पैसे कि पूरी कीमत अदा करने, उच्च कोटी कि सेवा प्रदान करने और साफ-सफ़ाई जैसी बातों का ख्याल रखते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए कटिबद्ध हैं। निश्चित रूप से यह एक अदबुध एहसास दिलाने वाला मिशन स्टेटमेंट लगा, विशेषकर तब जबकि इसके माध्यम से वह अपने कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन जब यात्रियों की बात आती हैं तो ट्रे के साथ पेश पेपर-कोस्टर पर अगर थेंक यू फॉर चूसिंग इंडियन रेलवे ( भारतीय रेल से यात्रा करने के लिए आपको धन्यवाद) जैसा स्टेटमेंट लिखा होता तो यह निश्चित रूप से ट्रेन से यात्रा करने वाले यात्रियों के होठों पर मुस्कान लाने में काफी मददगार साबित होता, हालांकि यह बात अगर रेलवे कर्मचारी अपने मुह से कहते तो कहीं ज्यादा सुखद लगता, लेकिन रेलवे के कर्मचारी आमतौर पर किसी को इस तरह से धन्यवाद देने के आदि नहीं होते, इसलिए पेपर-कोस्टर के माध्यम से ही धन्यवाद दिया जा सकता था। गौर करें कि हर एयरलाइन होस्टेस विमान के उतरने से पहले यात्रियों को धन्यवाद ज्ञापित करती हैं। इसके अलावा प्रथम श्रेणी के डिब्बे में लगी पेंटिंग ने भी मेरा ध्यान आकर्षित किया। इन पेंटिंग्स के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई, मसलन इन्हें किसने बनाया या ये किस चीज़ को प्रदर्शित करती हैं। इत्यादी-इत्यादी। आप ज़रा सोंचे इस उच्च-श्रेणी के डिब्बे में यात्रा करने वाले यात्री १५-१६ घंटे या इससे अधिक समय ट्रेन में गुजारते हैं ओर कोई भी एक दुसरे की तरफ देखता या मुस्कराता तक नहीं, बातें करना तो दूर कि बात हैं। कम से कम पेंटिंग और अनेक दूसरे तरह के नज़ारे पेश कर तथा उनके बारे में कुछ लिखकर यात्रियों के ज्ञान को बढाया जा सकता हैं और उनको मुस्कराने के बहाने मुहैया कराये जा सकते हैं। फंडा यह हैं कि जिन प्रीमियर श्रेणी के यात्रियों या ग्राहकों से आप इतना लाभ कमाते हैं, उनको सेवाएं प्रदान करने में तो कोताही न बरतें।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-340560091292180419?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/340560091292180419'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/340560091292180419'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_12.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-6342300653473524269</id><published>2008-03-11T21:43:00.003+05:30</published><updated>2008-03-11T22:21:59.842+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;कंपनियों को कैसे कर्मचारी चाहिए&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;एक बडी कम्पनी में एक एक्जीक्यूटिव यानी व्यवस्थापक हुआ करता था, जिसकी कम्पनी में काफी पूछ-परख थी, क्योंकि वह हर तरह के काम का जानकार था, वह कर्मचारियों की कार्यालयीन समस्याओं को सुलझाता था, और उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को हल करता था और सरकारी बाबुओं से कामकाज करवा लेता था । दरअसल वह कई लोगों के लिए एक अवतार जैसा हो गया था। कम्पनी खुलने के शुरूआती चरणों में उसने प्रबंधन के कई काम पूरे किए । धीरे-धीरे कंम्पनी प्रगती करने लगी और उसने अपना व्यापक विस्तार करना शुरू कर दिया। बाद में ऐसे हालत बने कि कम्पनी ने उस व्यवस्थापक को , जो एक समय उसकी सारी गतिविधियों का केन्द्र हुआ करता था, दरकिनार कर दिया उसे कोई काम नहीं दिया गया। उस एक्ज़िक्युटिव में हताशा घर कर गई । उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। दरअसल कम्पनी ने अगले प्रोजेक्ट के लिए उसे रिजर्व में रखा था। उसके काम, काज की जिम्मेदारी किसी दूसरे प्रशिक्षित एक्जिक्युटिव को एक खास उद्देश्य के तहत सॉप दी गई थी। दूसरी तरफ एक रफ-टाइप के व्यक्ति को आफिस में महत्व मिलने लगा। प्रमुख सरकारी प्रोजेक्टों के लिए मैंनेजमेंट ने उसकी सलाह लेनी शुरू कर दी। वह व्यक्ति काम करने के लिए वे सारे तौर-तरीके अपनाता था, जो नैतिक रूप से भले गलत हों, मगर कारोबारी जगत में इस एक खास हुनर माना जाता था। पहले वाला एक्जिक्युटिव एक दिन एम डी (प्रबंध, संचालक) के केबिन में आ धमका और अपने दिल का गुबार निकाला उसने सीधे-सीधे कम्पनी में अपनी हैसियत के बारे में पूछा। एमडी ने बेहद संत लहजे में उससे कहा -हर संगठन में एक थिंक-टैंक की जरूरत होती है, जो कम्पनी की योजनाओं और कार्यक्रम आदि के बारे में विचार करता है, संगठन को ऐसे लोगों को जरूरत होती है जो किसी भी काम को कैसी भी हालत में और हरसंभव तरीकों से करने में माहिर होते हैं। जिनमें एक स्वाभिमानी व्यक्ति कुछ कठिनाई महसूस करता है। आपको ऐसे व्यक्तियों की भी जरूरत होती है, जिनके बगैर आपका बिजनेस करना संभव नहीं होता, लेकिन ये कम्पनी में रहकर पीछे से काम करते हैं। इसके अलावा आपको ऐसे लोगों की भी आवश्यकता होती है, जो नए प्रोजेक्ट्स और आइडियाज़ पर काम करते हैं । जब कंपनी शुरू होती है तो ऐसे लोगों को सबसे अधिक महत्व मिलता है। जब सरकारी मंजूरी लेने जैसे काम होते हैं तो ऐसे लोगों कि तलाश होती जो इस तरह के काम में माहिर होते हैं। उन्हें प्राथमिकता मिलती हैं। जब रोजमर्रा कि समस्याओं को हल करने कि बात आती हैं तो तुम्हारे जैसे लोगों कि आवश्यकता होती हैं, जिन्हें हर तरह के काम निपटाने में प्रवीणता हासिल होती हैं। इसलिए तुम्हें परेशान होनें कि ज़रूरत नहीं हैं। जिस तरह हाथ कि सभी उंगलियाँ बराबर नहीं होती, उस तरह एक संगठन को हर तरह के लोगों कि ज़रूरत होती हैं। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;फंडा यह हैं कि किसी भी कंपनी में योजनाओं और उत्पादों पर सोच-विचार करने वाले और उनका क्रियान्वयन करने वाले दोनों तरह कि लोगों कि ज़रूरत होती हैं। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-6342300653473524269?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/6342300653473524269'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/6342300653473524269'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_11.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-7775287509803027960</id><published>2008-03-10T00:24:00.003+05:30</published><updated>2008-03-10T00:32:43.889+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;आत्मोत्थान के फार्मूले&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जो अपनी सामान्य नींद में कतर-ब्योंत कर रहे होते हैं, सच्चे अर्थों में देखें तो वर्तमान में वे अपने उपर सर्वोत्तम निवेश कर रहे होते हैं। निवेश की यह मात्रा भविष्य में उन्हें कई गुना लाभ प्रदान करती हैं। इसलिए सलाह है की हर सुबह एक घंटा अलग से व्यक्तिगत विकास सम्बन्धी गतिविधियों में लगाएं इस समय का उपयोग योग, ध्यान, दिन की कार्ययोजना तैयार करने प्रेरणास्पद कहानियां पड़ने में कर सकते है जिससे दिन की शुरूवात बेहद सकारात्मक वातावरण में हो सकती है।इसके अलावा प्रतिदिन पांच मिनट का ठहाका लगाएं इससे शरीर की क्रियाओं में संतुलन स्थापित होता है। आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा की एक चार साल का बच्चा एक दिन में ओसत ५०० बार खिलखिलाकर हंसता है, जबकि एक व्यस्क इन्सान बमुश्किल १५ बार हंस पाता है । वो भी एसे, मानो दूसरों पर एहसान कर रहा हो।एक बात और की सप्ताहांत या रविवार का दिन अपने परिवार की लिए विशेष रूप से रिजर्व करके रखें। इसे अपनी जिन्दगी के एक मकसद के रूप में लें। ध्यान केन्द्रित करने की अपनी क्षमता बडाने के लिए सीड़ियों से उतरते समय अपने कदमों की गड़ना किया करें। जुन्दगी में सफलता हासिल करने वाले कई इस फार्मूले का इस्तेमाल करते हैं। अपने आत्मबल को बढाएं इसके लिए पहले इसका अभ्यास करें और धीरे-धीरे इसकी हदें बदाएं। जब आप भूक का एहसास करें तो भोजन और एक घंटे बाद करें। जब आप किसी कठिन काम को करने में लगे हों, इसी दोरान अचानक आप का दिमाग आराम के बहाने ढूँढने लगे तो इस हुड़क का गला घोंट दे आप पायेंगे की आपके अंदर ध्यान-केन्द्रित अवस्था में घंटों बैठे रहने की शक्ति अपने आप पैदा हो जाती है। गुरूत्वाकर्षण की खोज करने वाले वैज्ञानिक न्यूटन में काफी लम्बे समय तक चुपचाप बैठकर सोचते रहने की अद्भुत क्षमता थी आप भी ऐसी क्षमता विकसित कर सकते हैं। अपने निकटतम परिजनों से अलग किसी बाहरी और अजनबी व्यक्तियों से अपने स्वास्थ, धन-सम्पदा और व्यक्तिगत मामलों पर बातें न करें। ऐसे मामलों में बेहद अनुशासित रहें।&lt;br /&gt;फंडा यह है की जिन्दगी में सफलता के लाखो-लाख फार्मूले हैं, जिन्हें सफल इंसानों ने अपनाया और विकसित किया है। इनको अपनाकर और अपने अनुभव के आधार पर नये फार्मूले गढ़कर आप भी अपनी जिन्दगी को सफल बना सकते है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-7775287509803027960?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/7775287509803027960'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/7775287509803027960'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_09.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-8250976676545011703</id><published>2008-03-09T00:44:00.003+05:30</published><updated>2008-03-10T00:37:58.550+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;समय के साथ प्रवाहमान और परिवर्तनशील रहें&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; हर सो साल में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलते हैं। हम समय की दीवार को फंदकर जब दूसरी तरफ जाते हैं, तब तक हर एक चीज का कायाकल्प हो चुका होता है। इसके बाद तदनुसार समाज स्वयं को ढालता है और सुव्यवस्थित करता है। एक उदाहरण के जरिए इसे बेहतर ढंग से समझ सकते है:- ४० साल पहले जो साईकिल-रिक्शा आम हुआ करता था, अब यह पुरानी बात हो चुका है। अधिकतर शहरों और कस्बों में इनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। हो सकता है की मोजूदा ऑटो-रिक्शा कुछ समय के अंतराल पर नैनो में तब्दील हो जाए। आने वाले ३० सालों में हमारे नाती-पोतों को घोर आश्चर्य हो कि आख़िर लोग तिपहिया वाहनों में कैसे यात्रा करते रहे होंगे, तब की पीढी के दिमाग में शायद इतना ही हो की वाहन दो-पहिया हो सकते है या फ़िर चो-पहिया, तिपहिया तो बिल्कुल नहीं ।&lt;br /&gt;सच तो यह है की इतने सब कायाकल्प के पश्चात जन्म लेने वाले लोग अपने दादा-दादी, नाना-नानी की उस दुनिया की कल्पना ही नहीं कर सकते, जिनमें वे रहा करते थे या पैदा हुए थे। सेलफोन जो अभी कल बाजार में आया है, वह आज पुराना पड़ जाता है। इसका मतलब साफ है की कल का अन्वेषण आज इतिहास बनकर रह जाता है। यह उदाहरण इस बात की तसदीक करता लगता हैं की अन्वेषण की रफ्तार किसी भी दूसरी चीज से तेज होनी चाहिए। २४ घंटे लगातार समाचार फेंकने वाले चैनल दर्शकों में अपनी अहमियत और साख कायम रखने के लिए महाकवि कालिदास की यह उक्ति दोहराते लगते है की, क्षणे-क्षणे यान्न्वातामुपैती तदैव रूपम फंदा यह है की पुराने यश और गोरवगाथा को दोहराते न बैठे रहें हमेशा स्वयं को समय और माहोल के अनुसार बदलते व संवारते रहें इसमें पल भर की देरी न करें वरना आप पीछे रह जाएगें।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-8250976676545011703?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/8250976676545011703'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/8250976676545011703'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_08.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-543431736646191253</id><published>2008-03-07T19:33:00.002+05:30</published><updated>2008-03-07T19:39:34.797+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;strong&gt;विनम्रता और महानता के बीच कोई रेखा नहीं होती &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;में हाल ही में डेक्कन क्वीन से पुणे से मुम्बई की रेल यात्रा पर था। ट्रेन में मेरी मुलाकात एक ऐसे इन्सान से हुई, जो देखने में किसी ग्रामीण जैसा नजर आता था। वह थक मेरे आगे वाली सिट पर बैठा था। संक्षिप्त परिचय के बाद उसने मुझसे पूछा की एक पत्रकार होने का मतलब क्या है- दुसरे शब्दों में एक पत्रकार का कामकाज कैसा होता है? मेने उसे बताया की पत्रकार का काम हर रोज़ 'इन द लाइन ओफ फायर' होने जैसा है, क्योंकि लाखों-लाख पाठक आपके लिखे शब्दों को पड़ते और उसको जज करते है। मुझे उम्मीद है की आप समझ रहे होंगे की 'इन द लाइन ऑफ़ फायर' का मतलब क्या है?हाँ, सर में जानता हूँ। जब हमें रात के अंधेर में पाइंट -४८७५ पर्वत शिखर पर कब्जा करने का आदेश मिल था, तो हम उस समय कुल ३० सैनिक थे । दुश्मन ऊपर से हम पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा रहा था। हमें इसे बात का बिलकुल पता नहीं था की अगली गोली किस तरफ से आएगी और उसका निशाना हममें से कौन बनेगा । जब सुबह हम शिखर पर तिरंगा फहराने में सफल हुए, तब हमारे साथ केवल ४ सैनिक बचे थे । इसका मतलब आप एक_ _ ? मेरी जबान बिलकुल लड़खडा सी गई और शब्द मेरे हलक में ही अटके रह गए थे । में सूबेदार सुशांत हूँ। में १३ जम्मू कश्मीर रायफल्स से ताल्लुक रखता हूँ । में कारगिल की लड़ाई के दौरान ४८७५ चोटी पर तैनात था। अब वे कहते हैं कि मेरा टर्म खत्म हो गया है और में अब एक आसन सी नौकरी के लिए आवेदन कर सकता हूँ। लेकिन सर आप ही बताइए, क्या में ड्यूटी इसलिए छोड़ दूँ की इससे जिंदगी आसन हो जाती है ?उस चोटी पर कब्जा जमाने वाली सुबह मेरा एक साथी बर्फ में घायल पड़ा था। उसे दुश्मन अपनी गोली का निशाना बना सकता था। दूसरी तरफ हम एक बंकर में छुपे हुए थे उस साथी सैनिक को वाहन से सुरक्षित बंकर में लाना मेरी ज़िम्मेदारी थी। लेकिन हमारे कप्तान ( कप्तान बत्रा ) साहब ने अनुमति देने से साफ इंकार कर दिया इसकी जगह वे खुद गए । साहब ने कहा के केडेट बनते समय उन्होने जो पहली शपथ खाई थी वह यह की राष्ट्र की सुरक्षा व कल्याण सर्वोपरि होगा और उसके बाद नंबर उनका होगा जिन्हें वो कमांड कर रहे होंगे। उनकी सुरक्षा और हित अंत में आएगा, हमेशा और हर पल_ _ _।कप्तान बत्रा घायल सैनिक को सुरक्षित बंकर में लाये, मगर उसको बचाने में सारी गोलियां अपनी पीठ और सिर में खाई और शहीद है गए। इस घटना के बाद जब हम हर सुबह पहरे पर तैनात होते हैं तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है मानो बत्रा साहब वे सारी गोलियां अपने सीने पर झेल रहे हैं, जो दरअसल हमारे लिए थी। में अच्छी तरह जानता हूँ सर _ _ 'इन द लाइन ओफ फायर' का मतलब क्या होता है।मुझे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं है रहा था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इस सैनिक की बात पर क्या कहूँ ट्रेन जैसे ही स्टेशन पर पहुंची, सूबेदार सुशांत ने उतरने के लिए अपना सामान समेटा और मुझसे हाथ मिलाते हुए बोला - 'आपसे मिलकर काफी खुशी हुई सर' हाथ मिलाते हुए लगता था, जैसे मेरे हाथों को कुछ सूझ नहीं रहा था। मेने महसूस किया के जिन हाथों को मेने हाथ में लिया है, वे पहाडों की चोटियाँ नाप चुके हैं, ट्रिगर पर पड़े हैं और तिरंगा झंडा फहरा चुके हैं। कब में अटेंशन में खड़ा हो गया और मेरे हाथ स्वमेव सेल्यूट की मुद्रा में उठ गए। मेने सोचा की हम देश के जवानों के लिए कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं। मेरे दिल में एक हूक सी उठी की जिस इन्सान से में इन लाइन ओफ फायर का मतलब समझने की उम्मीद कर रहा था वह समझ ही नहीं रहा था बल्कि उसे जी भी रहा था और उसने सही अर्थों में मुहे इसका मतलब समझाया। यही मेरी ज़िंदगी का फंडा है। विनम्रता से रहें, शायद महान लोग हमारे आस-पास हों, और हमें उनकी खबर न हो।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-543431736646191253?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/543431736646191253'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/543431736646191253'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_07.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-2959245613031882594</id><published>2008-03-06T21:58:00.004+05:30</published><updated>2008-03-08T16:22:20.191+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;पद की बजाये परिणाम पर जोर दें&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पदनाम का महत्व बहुत कम होता है पद से कोई भी लीडर नहीं बनता। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जो संगठन पद और पदनाम पर बहोत ज्यादा जोर देते हैं उनके कर्मचारी भी ऐसा करना सीख लेते हैं । इस माहोल में कर्मचारी की मूल चिंता यही होती है की येन-केन-प्रकानेन सीड़ी के अगले पायदान पर चढ़ जाएं या ज्यादा महत्वपूर्ण पद हासिल कर लें, वास्तविकता तो यही है की पदनाम का महत्व बहोत ही कम होता है। ऊँचे पदनाम से खराब प्रदर्शन करने वालों को कोई मदत नहीं मिलती । इसी तरह कम महत्वपूर्ण पदनाम बेहतरीन प्रदर्शन करने वालों के आड़े नहीं आता है। पद से कोई लीडर नहीं बनता है&lt;br /&gt;लीडरशिप के पांच स्तरों -पद, अनुमति, उत्पादन, लोगों का विकास और किंवदंती में पद सबसे नीचे का पायदान है, जो व्यक्ति अपने पद के आधार पर लीडरशिप का दावा करता है, उसका प्रभाव कभी उसके पद के अधिकारियों से आगे तक नहीं पहुच सकता। वरिष्ठता से भी ज्यादा लाभ नहीं होता है। एक कर्मचारी भर्ती संस्था के मुताबिक प्रमोशन के लिए कर्चारियों के मूल्यांकन का ६६ फीसदी आधार विशिष्ट उपलब्धियों पर टिका होता है। ४७ फीसदी सामान्य कार्य, आदतों और प्रदर्शन पर ध्यान देते हैं तो सिर्फ ४ फीसदी ही वरिष्ठता को महत्वपूर्ण मानते हैं। कह सकते हैं की नौकरी में बिताया गया समय सफल परिणाम या बेहतर प्रदर्शन का विकल्प नहीं है।&lt;br /&gt;परिणामों पर जोर देने वाले संगठन में पूरा ध्यान और उर्जा काम को अच्छी तरह से करने में लगती है। टीम भावना का माहौल रहता है। सभी लोग संगठन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समर्पित होते है। ऐसे ही माहौल में लीडर्स उभरकर सामने आते हैं. जैसा की जनरल इलेक्ट्रिक के प्रेसिडेंट चार्ल्स विल्सन ने कहा था ' बोतल चाहे किसी भी आकर की हो, मलाई हमेशा सबसे ऊपर पहुच ही जाती है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-2959245613031882594?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/2959245613031882594'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/2959245613031882594'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_06.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-4057661556674678210</id><published>2008-03-05T00:18:00.002+05:30</published><updated>2008-03-10T00:40:27.664+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;एक अच्छा काम की अच्छाइयों को जन्म देता है&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;में हाल ही में मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में स्थित एक आश्रम दादाजी धम में था। इस स्थल वर्ष १९३० में समाधि लेने वाले संतबाबा के बारे में कहा जाता है की वे कपडे तक नहीं पहनते थे। अपने भक्तों से उन्हें जो भी दान में मिलता था, उसका उपयोग गरीबों और जरूरतमंदों के कल्याण में किया जाता था।गुरूपूर्णिमा के अवसर पर दादाजी धम पर लाखों भक्तों की भीड़ इकट्ठा होती है। यह धाम आजकल लाखों की संख्या में छात्र समुदाय का हित कर रहा है। अपने आसपास और जिले भर में सैकडों परोपकारी गतिविधियों का संचालन करता है। इस आश्रम में रोल्स, रोयंस और मर्सीडीज बेंज की पुरानी-से- पुरानी गाडियाँ खडी हैं, जिन्हें संतबाबा के भक्तों ने भेट किया था, मगर उन्होने इनका कभी इस्तेमाल अपने लिए नहीं किया। मुझे बताया गया की गुरुपुर्निमा के दिन सभी स्थानीय लोग और व्यापारी गलियों तथा सड़कों पर आकर बाहर से आने वालों के लिए खाना- पानी, आश्रय और तमाम सुविधाओं का इंतजाम करते हैं। एक व्यापारी ने तो यहाँ तक बताया की यहाँ के लोगों की भरसक कोशिश यह होती है की आश्रम में पधारने वाले ग्राहकों को ठहरने के दोरान अपने पास से अपनी मूलभूत जरूरतों कई पूर्ती के लिए एक चवन्नी भी खर्च न करनी पड़े। व्यापारी समुदाय में व्याप्त इस तरह की कल्याण व परोपकार की भावना साफ झलकती है। उनका मानना है की इसकी वजह आश्रम व संतबाबा के सन्देश है। फंडा यह है की जिस इन्सान ने आजीवन अच्छा काम करने का निश्चय किया हो, अपने पीछे वह मानवता के कल्याण के लिए अनगिनत परोपकारियों की फोज खडी कर देता है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-4057661556674678210?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/4057661556674678210'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/4057661556674678210'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_04.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-3412853770044362385</id><published>2008-03-04T00:15:00.001+05:30</published><updated>2008-03-10T00:43:07.520+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;कारोबारी सफलता का नया फार्मूला&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;आप महंगी चीजों को उस ग्राहक वर्ग तक पहुंचाएं, जो हमेशा उस खास सेवा या उत्पाद के लिए लालायित रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आख़िर इस दुनिया में ऐसा कोन होगा, जो स्पाँ (एशो- आराम वाला रिजार्ट या रिजार्ट होटल ) नहीं जाना चाहता है? शायद आपको मालूम हो की स्पां केवल पांच सितारा होटलों में मोजूद होता है। यहाँ पर महज तीन घंटे बिताने के एवज में हमारी जेब को १५०० से ८००० रूपए की चपत लग सकती है। कुछ शीर्ष स्तर के होटल तो इसके लिए २५००० तक वसूलते हैं। यदि आप पर्यटकों कि पसंदीदा सैरगाहों, केन्द्रों पर जाएं तो आपको वहां पर केवल आयुर्वेद ट्रीटमेंट जैसी थेरेपी के लिए एक लाख रूपए तक का भुगतान करना पड़ सकता है।लेकिन इस स्पां आनंद का अनुभव आम लोगों की पहुंच में लेन के मकसद से आई आई टी और आई आई एम के चार स्नातकों - अनुराग केडिया, अर्नब मित्रा, सौरभ गर्ग और सुनील राव ने 'द फॉर फाउन्तैन स्पा नामक एक कंपनी खोली और पुणे में ये सुविधाएं मुहैया करानी शुरू की। यहाँ पर ग्राहकों से उनकी पसंद के मुताबिक ४०० से १४०० रूपये चार्ज किया जाता है और उन्हें पांच सितारा के स्पा का अनुभव प्रदान किया जाता है। यह प्रयोग तेजी से उभरते उच्च मध्यवर्ग के गाहकों में खासा लोकप्रिय हो गया। कंपनी ने अपनी इस सफला को दूसरे शहरों तक ले जाने की तैयारी शुरू कर दी है। देश में वर्तमान सपा का अनुमानित बाजार १०० करोड़ रूपए का है। इसके वर्ष २०१५ तक ४००० करोड़ रूपए तक पहुंच जाने की उम्मीद है। जरा आप इस कंपनी की संभावनाओं का अनुमान लगाएं जो उस जनसंख्या को स्पा का सुख उपलब्ध करा रही है, जो महज खासा खर्चीला होने की बिना पर पांच सितारा होटलों में जाने से परहेज करती है। कंपनी २५-३५ आयुवर्ग के नोजवानों को लक्षित कर रही है जो काफी मोटी रकम कम राहे हैं और जिंदगी के हर रंग का मज़ा लेना चाहते हैं। फंडा यह है कि कारोबारी सफलता का एक राज यह भी है कि आप महंगी चीजों को उस ग्राहक वर्ग तक पहुँचायें, जो हमेशा उस खास सेवा या उत्पाद के लिए लालाइत रहता हैफंडा यह है कीकारोबारी सफलता का एक राज यह भी है की आप महंगी चीजों को उस ग्राहक वर्ग तक पहुँचाए , जो हमेशा उस खास सेवा या उत्पाद के लिए लालायित रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-3412853770044362385?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/3412853770044362385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/3412853770044362385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_03.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-1088676150956657838</id><published>2008-03-03T00:30:00.002+05:30</published><updated>2008-03-10T00:46:09.152+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;उत्पादकों के समक्ष संवेदनशीलता की चुनौती&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हाल ही में मुंबई महानगर में एक सर्वेक्षण किया गया। इसमें पाया गया की युवा पीड़ी का धुम्रपान के प्रति ज्यादा रूझान नहीं है । दुसरे शब्दों में कहें तो युवा वर्ग की प्राथमिकता सूची में धुम्रपान इसलिए नहीं है क्योकि इससे उनके कुछ मित्रों को एलर्जी होती है यानी यह उन्हें पसंद नहीं है हालांकि ये युवा व्यक्तिगत रूप से धूम्रपान के प्रति मोह जताते हैं, मगर इसका एक वर्ग अपने दोस्तों के दबाव में इसे छोड़ देता है । कुछ लड़को ने तो खुलेआम यह स्वीकार किया की माता-पिता के बजाए मित्रों का दबाव धूम्रपान की लत छुडाने में ज्यादा कारगर साबित होता है। एक रोचक बात यह भी है की इसके आदी युवाओं पर विपरीत-सेक्स का दबाव भी काफी पड़ रहा है और कारगर साबित हो रहा है । अमेरिका में हाल में ही गठित एक गैर-लाभ आधारित संगठित परफ्यूम फाउन्डेशन का विश्वास है की लोगों को अगर कोई परफ्यूम पसंद नहीं होता, तो वे इसका प्रयोग करने वालों का साथ छोड़ देते हैं, यहाँ तक की इसकी वजह से दंपत्तियों के बीच तलाक भी हो सकता है। इस फ़ाउन्डेशन ने कुछ अनुठे तथ्य भी पेश किये है, मसलन:- एक ही कार्यालय में काम करने वाले लोग अक्सर एसे कर्मचारियों से दूर रहना पसंद करते हैं जिनके लगाए परफ्यूम वे पसंद नहीं करते। फिर भले ही वह कर्मचारी दूसरी केबिन में बैठता हो।&lt;br /&gt;इसी तरह का एक मामला अमेरिका में बर्गर बेचने वालों से संबंधित है। ये प्याज-रहित बर्गर के निर्माण को तरजीह दे रहा है। ताकि कंपनियों के एक्ज़क्युतिव की मीटिंग बेरोकटोक चल सके। दरअसल बात यह है की अमरीकी लोग मीटिंग में जाने से पहले लंच में बर्गर खाने के आदी है। एक अध्ययन के दौरान यह चौकाने वाली बात सामने आई की प्याज- रहित बर्गर बनाने बाली कंपनियों के बर्गर एक्ज़क्युतिव-क्लास में बडे पैमाने पर पसंद किए जा रहे है, और बेचे जा राहे हैं। बजाय ब्रान्डड और प्याज-वाले बर्गर के। ऐसा इसलिए था की मीटिंग के दौरान ज्यादातर लोग होते है, जिन्हें मुंह से निकलने वाली प्याज के गंध पसंद नहीं आती ।&lt;br /&gt;ऊपर जो दो तीन उदाहरण दिए गए हैं, उनसे एक सामान्य बात उभरकर सामने आती है, वह यह की तीनो उदाहरणों का संबंध मानव संवेदनशीलता से है. यदि लोगों को कुछ चीस पसंद नहीं है तो उनके प्रति उत्पादकों और निर्माताओं को संवेदनशीलता दिखानी पड़ती है।&lt;br /&gt;फंदा यह है के उधोगों और कम्पनियों को भविष्य में मानव संवेदनशीलता के प्रती जागरूक होना पडेगा। उन्हें अपने उत्पाद और उनके ग्राहक के प्रति ही नहीं, बल्कि जो उनके ग्राहक नहीं है, उनका भी ध्यान करना पडेगा। एसे लोग अपने प्रभाव के इस्तेमाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके बाजार पर विपरीत असर डाल सकते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-1088676150956657838?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/1088676150956657838'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/1088676150956657838'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post_02.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-7485701411810045437</id><published>2008-03-02T00:08:00.006+05:30</published><updated>2008-03-10T01:37:26.277+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;ठंडे दिमाग से सोचने का माद्दा रखें&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वर्षों पहले की बात है। एक किसान दुर्भाग्यवश अपने गाओं के महाजन के बड़े कर्ज- जाल में फंस गया। महाजन एक खूसट और कुरूप बूढा था। उसकी नजर काफी समय से गरीब किसान की खूबसूरत लड़की पर थी । उसके दिमाग में एक खुराफात सूझी । उसने किसान के समक्ष यह घिनोना प्रस्ताव रखा की अगर वह उसके ऋण से हमेशा के लिए मुक्त होना चाहता है तो वह अपनी कन्या का हाथ सोप दे। उसकी इस बात को सुनकर किसान और उसकी बेटी, दोनों के रोंगटे खड़े हो गए ।&lt;br /&gt;बात न बनती देख महाजन ने नई चाल चली। उसने किसान को सुझाव दिया की अब भाग्य को ही उसके प्रस्ताव का फ़ैसला करने दो । महाजन ने कहा कि वह एक खाली मनीबैग में एक काला और एक सफेद कंकड़ रखेगा। इसके बाद लड़की को बैग में से एक कंकड़ निकालना पड़ेगा। यदि लड़की काला कंकड़ निकालती है, तो वह उसकी पत्नी हो जाएगी और इसके साथ पिता का कर्ज पूरी तरह माफ़ कर दीया जाएगा। लेकिन अगर सफेद कंकड़ निकालती है तो लडकी को शादी से मुक्ति तो मिलेगी ही, साथ-साथ कर्ज भी पूरी तरह माफ़ कर दिया जाएगा ।&lt;br /&gt;किसान और उसकी बेटी महाजन के साथ कंकड़ों से भरे अपने खेत में खडे थे । वे बातों में मशगूल थे, तभी महाजन ने धीरे से दो काले कंकड़ जमीन से उठाए और चुपके से बैग में डाल दिए। यह बात लड़की की तेज आखों ने ताड़ ली कि महाजन ने दोनों काले कंकड़ बैग में डाले है। महाजन ने अब लडकी से बैग से एक कंकड़ निकालने के लिए कहा । अगर आपको लड़की को सुझाव देना है तो कोनसा कंकड़ निकालने की सलाह देगे?&lt;br /&gt;सावाधानिपूर्ण विशलेषण तीन विकल्प सामने पेश करता है--&lt;br /&gt;१) लडकी को कोई भी कंकड़ निकालने से साफ मना कर देना चाहिए ।&lt;br /&gt;२) लडकी को बैग से दोनों काले कंकड़ निकालकर महाजन की धूर्तता का पर्दाफाश कर देना चाहिए ।&lt;br /&gt;३) लडकी को कोई भी कला कंकड़ निकालकर अपने पिता को जेल या ऋण से मुक्ति देने के लिए खुद को कुर्बान कर देना चाहिए ।&lt;br /&gt;लेकिन लडकी ने वह किया, जिसकी आप या हमने कल्पना भी नहीं की होगी ।&lt;br /&gt;लड़की ने बैग में हाथ डाल एक कंकड़ निकाला और बगैर उसे देखे टटोलने के अंदाज में अनजान सी बनते ही कंकड़ को कंकड़ों से भरे खेत में गिरा दिया। उसे दोबारा खोज पाना मुशिकल था। उसने आह सी भरते हुए कहा, उफ़ ! मुझसे एक कंकड़ भी सम्भाला न जा सका । लेकिन अगले ही पल संभलने के अंदाज में कहा- फिर भी कोई बात नहीं, बैग में अभी एक कंकड़ बचा है उसे देखकर पता चल जायगा की मैनें कैन से रंग का कंकड़ उठाया था।&lt;br /&gt;अब चूंकि बैग में बचा कंकड़ काला है, इसलिए इससे मान लिया जाएगा की उसने पहले सफेद कंकड़ उठाया था। दूसरी तरफ साहूकार यानी महाजन भी यह बताने की हिम्मत नहीं कर सकता था की उसने बेईमानी की है। इस तरह लड़की ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। यानी उसने अपने पिता को कर्ज के जाल से मुक्ति का रास्ता खोज लिया और उसे स्वयं भी महाजन की ghranit चाल से छुटकारा पा लिया। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फंदा यह है की हर जटिल हालत से निकलने के रास्ते होते है। लेकिन ऐसा तभी सम्भव है जब हम ठंडे दिमाग से सोचने का धैर्य दिखाएँ । &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-7485701411810045437?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/7485701411810045437'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/7485701411810045437'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-3218553201081827472</id><published>2008-03-01T00:26:00.001+05:30</published><updated>2008-03-10T01:39:09.277+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;मन के हरे हार है मन के जीते जीत&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पुणे में 'स्मार्ट-इन ' नाम का एक होटल है। यहाँ पर दो लोगों को एक रात ठहरने के लिए महज १२०० रूपए का भुगतान करना पड़ता है। इसमे कर और पेट भर ब्रेकफास्ट की कीमत शामिल है। मुझे इस होटल के ३५ वर्षीय मालिक हर्षद तलेरा, जो चलने-फिरने से लाचार होने की वजह से व्हील चेयर पर चलते है,&lt;br /&gt;तलेरा ने मुझे एक एसी कहानी सुनाई, जिसे हर बिजनेसमैन सुनना पसंद करेगा। बात यह है की तलेरा हमेशा अपने सपनों का एक न्यारा सा होटल खोलने का सपना देखा करते थे, जिसमें या तो आदमियों की बिलकुल ही जरूरत न हो या उनकी कम से कम की आवश्यकता हो । प्रोधोगिकी से लैस इस होटल को शुरू करने के लिए तलेरा को होस्पिटालिटी मैनेजमेंट की शिक्षा प्रदान करने वाली कन्रेम यूनिवर्सिटी की कन्सल्टेंसी की जरूरत महसूस हुई । इसमें तकरीबन २० लाख अमेरिकी डालर खर्च होने का अनुमान था।&lt;br /&gt;आपको बताते हुए आश्चर्य हो रहा है की तलेरा ने इसके लिए अपना सब कुछ दाव पर लगाया और आखिरकार वे कर्नेल यूनिवर्सिटी में होस्पिटालिटी मैनेजमेंट के दो वर्षीय कोर्स के छात्र बने और आखिरकार 'ओप्निग होटल विदाउट मैनपावर आर लैस मैनपावर' नामक प्रोजेक्ट को हाथ में लिया। जो कंसल्टेंट्स उन पर २० लाख डालर का शुल्क लगा रहे थे, आखिरकार इसमें एक फूटी कोड़ी भी लागत नहीं आई, क्योकि तलेरा स्वयं एक छात्र थे। उन्होने प्रोजेक्ट पूरा किया, आला दर्जे से यूनिवर्सिटी पास की और पुणे वापस आकर किसी भी समय में महज तीन प्रबंधकों की मदद से चलने वाले 'स्मार्ट-इन' होटल का निर्माण करने का फैसला किया। पूरे होटल का संचालन कम्प्यूटरों गिज्मो और टेक्नोलाजी के माध्यम से किया जाता है। यदि आपको कम्प्यूटर आदि के बारे में जानकारी नहीं तो आपको इस होटल में रूम हासिल करना तकरीबन नामुमकिन है। हालांकि हर्षद तलेरा शरीरिक रूप से अपांग है , लेकिन मुझे उन्हें देखकर खुद मानसिक अपंगता का एहसास होने लगा।&lt;br /&gt;फंडा यह है की जीवन के किसी भी क्षेत्र में महारत हासिल करने या सफलता की ऊँचाइयाँ छूने में आपकी शरीरिक अपंगता बाधक नहीं हो सकती , बशर्ते आप मानसिक तोर पर इसके लिए प्रतिबद्ध हो।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-3218553201081827472?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/3218553201081827472'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/3218553201081827472'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/02/blog-post_29.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-5105965205971024040</id><published>2008-02-28T23:46:00.001+05:30</published><updated>2008-03-10T01:42:53.274+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;मेनेजमेंट कोई विज्ञान नहीं हैं&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;आज जहाँ हर जगह मेनेजमेंट गुरु और किताबें छाई हुई हैं, हमें अच्छी तरह समझ लेना होगा के मेनेजमेंट की असली परीक्षा हमारे काम के प्रदर्शन से ही होती हैं&lt;br /&gt;देश भर में फैले बुक स्टोर मेनेजमेंट की किताबों से अटे पड़े हैं। बिभिन्न क्षेत्रों और स्तरों पर काम करने वाले लोग सफलता के लिए मेनेजमेंट गुरुओं द्वारा लिखी पुस्तकों के बारे में पूछते रहते हैं। दरअसल हमारे देश की अर्थव्यवस्था या हमारी सामाजिक क्रियाशीलता को जितनी क्षति लाइसेंस के जरिये मेनेजमेंट विषय को पेशेवरों तक सीमित करने की कोशिश से पहुंचेगी, उतनी और किसी तरह से नहीं। लाइसेंस का मतलब इस बात से हैं की मेनेजमेंट के गलियारों में सिर्फ़ एक मेनेजमेंट-डिग्रीधारी ही प्रवेश करने का अधिकारी है सकता हैं। महान मेनेजमेंट गुरू पोटर ऍफ़ ड्रकर अपनी ताजातरीन पुस्तक दा डेली ड्र्कर में कहते हैं की यह सबसे बड़ी गलती हम सभी विभिन्न स्तरों पर करते हैं। वे कहते हैं की कुछ विशेष शैक्षणिक डिग्रीधारी लोगों तक मेनेजमेंट पदों को सीमित कर उधमी गलतियाँ करते जा रहे हैं। वे आगे कहते हैं की कुशल मेनेजमेंट की असली परीक्षा हमेशा आपके काम के प्रदर्शन से ही होती हैं। मेनेजमेंट को इस कसौटी पर कसा जाता हैं की यह काम वालों को अपना काम करने देता हैं या नहीं। दुनिया भर में बहुसंख्यक उधमी मेनेजमेंट को एक वैज्ञानिक और कुछ लोगों तक सीमित प्रोफेशन वाले ब्रांड का रूप देने में लगे हैं। ड्र्कर इस सोच को आर्थिक विकास के लिए बाधक मानते हैं। फंडा यह हैं की मेनेजमेंट यानी प्रबंधन का लक्ष्य और उद्देश्य ज्ञान के बजाये उपलब्धियाँ होनी चाहिए। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-5105965205971024040?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/5105965205971024040'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/5105965205971024040'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/02/blog-post_28.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-9165534411427379100</id><published>2008-02-27T00:16:00.002+05:30</published><updated>2008-02-27T00:48:29.734+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="color:#666600;"&gt;&lt;strong&gt;उत्पादकों के समक्ष संवेदनशीलता की चुनौती&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;हाल  ही में मुंबई महानगर में एक सर्वेक्षण किया गया। इसमें पाया गया की युवा पीड़ी का धुम्रपान के प्रति ज्यादा रूझान नहीं है । दुसरे शब्दों में कहें तो युवा वर्ग की प्राथमिकता सूची में धुम्रपान इसलिए नहीं है क्योकि इससे उनके कुछ मित्रों को एलर्जी होती है यानी यह उन्हें पसंद नहीं है हालांकि ये युवा व्यक्तिगत रूप से धूम्रपान के प्रति मोह जताते हैं, मगर इसका एक वर्ग अपने दोस्तों के दबाव में इसे छोड़ देता है । कुछ लड़को ने तो खुलेआम यह स्वीकार किया की माता-पिता के बजाए मित्रों का दबाव धूम्रपान की लत छुडाने में ज्यादा कारगर साबित होता है। एक रोचक बात यह भी है की इसके आदी युवाओं पर विपरीत-सेक्स का दबाव भी काफी पड़ रहा है और कारगर साबित हो रहा है । अमेरिका में हाल में ही गठित एक गैर-लाभ आधारित संगठित परफ्यूम फाउन्डेशन का विश्वास है की लोगों को अगर कोई परफ्यूम पसंद नहीं होता, तो वे इसका प्रयोग करने वालों का साथ छोड़ देते हैं, यहाँ तक की इसकी वजह से दंपत्तियों के बीच तलाक भी हो सकता है। इस फ़ाउन्डेशन ने कुछ अनुठे तथ्य भी पेश किये है, मसलन:- एक ही कार्यालय में काम करने वाले लोग अक्सर एसे कर्मचारियों से दूर रहना पसंद करते हैं जिनके लगाए परफ्यूम वे पसंद नहीं करते। फिर भले ही वह कर्मचारी दूसरी केबिन में बैठता हो।&lt;br /&gt;इसी तरह का एक मामला अमेरिका में बर्गर बेचने वालों से संबंधित है। ये प्याज-रहित बर्गर के निर्माण को तरजीह दे रहा है। ताकि कंपनियों के एक्ज़क्युतिव की मीटिंग बेरोकटोक चल सके। दरअसल बात यह है की अमरीकी लोग मीटिंग में जाने से पहले लंच में बर्गर खाने के आदी है। एक अध्ययन के दौरान यह चौकाने वाली बात सामने आई की प्याज- रहित बर्गर बनाने बाली कंपनियों के बर्गर एक्ज़क्युतिव-क्लास में बडे पैमाने पर पसंद किए जा रहे है, और बेचे जा राहे हैं। बजाय ब्रान्डड और प्याज-वाले बर्गर के। ऐसा इसलिए था की मीटिंग के दौरान ज्यादातर लोग होते है, जिन्हें मुंह से निकलने वाली प्याज के गंध पसंद नहीं आती ।&lt;br /&gt;ऊपर जो दो तीन उदाहरण दिए गए हैं, उनसे एक सामान्य बात उभरकर सामने आती है, वह यह की तीनो उदाहरणों का संबंध मानव संवेदनशीलता से है. यदि लोगों को कुछ चीस पसंद नहीं है तो उनके प्रति उत्पादकों और निर्माताओं को संवेदनशीलता दिखानी पड़ती है।&lt;br /&gt;फंदा यह है के उधोगों और कम्पनियों को भविष्य में मानव संवेदनशीलता के प्रती जागरूक होना पडेगा। उन्हें अपने उत्पाद और उनके ग्राहक के प्रति ही नहीं, बल्कि जो उनके ग्राहक नहीं है, उनका भी ध्यान करना पडेगा। एसे लोग अपने प्रभाव के इस्तेमाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके बाजार पर विपरीत असर डाल सकते हैं . &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-9165534411427379100?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/9165534411427379100'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/9165534411427379100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/02/blog-post_26.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-2940442851171099011</id><published>2008-02-25T17:13:00.001+05:30</published><updated>2008-02-25T17:35:52.783+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#666600;"&gt;मैं अभी तक हारा नहीं हूं&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;आज छत्रपति शिवाजी टर्मिनल के नाम से विख्यात विक्टोरिया टर्मिनल्स स्टेशन पर एक मूंगफली बेचने वाला विगत ३० वर्षों से अपना धंधा कर रहा है। यह अशिक्षित मूंगफली वाला यहाँ अपनी पत्नी के साथ रहता है। इस दम्पत्ती के दो बेटे हें। वर्षों से में उसे उसी स्टेशन के प्लेटफोर्म पर देखता आ रहा हूँ, लेकिन विगत दो माह से मेने उसे प्लेटफोर्म पर नहीं देखा। उसके स्थान पर अपने को उसका रिश्तेदार बताने वाले एक दूसरे मूंगफली वाले को बैठे पाया। मैंने उससे उस मूंगफली वाले के बारे में पूछा। इस पर उसने बताया की इस वक्त वह अमेरिका गया है।उसका जवाब सुनकर मेरे आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही फ़िर मेने पूछा की आख़िर वह अमेरिका कैसे और क्यों गया है? इस पर उसने खुलासा किया की उसका बेटा पड़ने खासकर फिजिक्स में बहुत तेज था और उसे अमेरिका के एक कालेज में अध्ययन हेतु प्रवेश मिला है। बेटे को अमेरिका सरकार की ओर से वजीफा मिला है और अपने बेटे के साथ ही वह भी अमेरिका गया है। उस मूंगफली विक्रेता का नाम यशवंत तांबे था। वह एक गाना गया करता था, जो की इस प्रकार है:बेच जरूर दिया है किस्मत ने मुझे समय के हाथों, पर में बेचारा नहीं हूँ। में थक जरूर गया हूँ दोस्तों, पर अभी तक हरा नहीं हूँ। अकेला हूँ, तनहा हूँ, पर तन्हाई से डरा नहीं हूँ। में फिर उठ खडा हुआ हूँ दोस्तों, जिंदा हूँ अभी तक मरा नहीं हूँ,इसमें कितनी सच्चाई है, ३0 वर्षों तक मूंगफली बेचने के बाद यशवंत ने यह सिध्ध कर दिया है की वह मरा नही है। कोई भी उसकी अवहेलना नहीं कर सकता है। फंडा यह है की आप कभी यह न सोचें की किस्मत ने आपको मार डाला है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-2940442851171099011?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/2940442851171099011'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/2940442851171099011'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/02/0_25.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-5722695449496718163</id><published>2008-02-22T18:05:00.000+05:30</published><updated>2008-02-22T18:06:26.504+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(102, 102, 0);"&gt;साइड इफेक्ट से सावधान रहें&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अमेरिका के हऊस्टन शहर में एक व्यक्ति ने जब होटल के अपने कमरे में प्रवेश किया तो वहां एक कंप्यूटर सिस्टम देखकर वह काफी खुश हुआ। उसने तुरंत अपनी बीवी को ई-मेल करने का निश्चय किया। लेकिन दुर्भाग्य से वह ई-मेल उसने एक ग़लत ई-मेल पते पर भेज दिया। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;ठीक इसी समय सेन फ्रांसिस्को नामक एक दुसरे शहर में वैधव्य को प्राप्त हुई एक महिला अपने पति का अन्तिम-संस्कार करके लोटी ही थी। उसने अपना ई-मेल चेक करने की इक्षा से कंप्यूटर को लॉग-आन किया। दरअसल वह अपने सगे-संबंधियों और मित्रों द्वारा भेजी गई शोक-संवेदनाओं के आने की उम्मीद कर रही थी। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;उसने ई-मेल बॉक्स खोला तो कई सन्देश दिखाई दिए लेकिन हाउस्टन से भेजे गए इस व्यक्ति के ई-मेल सन्देश को पढ़ते ही वह मूर्छित है गई। उसका बेटा तेजी से अपनी माँ को संभालने दुसरे रूम से भगा-भगा आया। उसकी माँ फर्श पर गिरी अपनी अन्तिम सांसें गिन रही थी। बेटे की नज़र कंप्यूटर स्क्रीन पर गई, जहाँ पर लिखा था:- &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;प्रति: माई डार्लिंग,&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;विषय: मैं सुरक्षित पहुँच गया। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;दिनांक: १८ दिसंबर २००६&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;- मुझे पता हैं, मेरे इस सन्देश को पढ़कर तुम बेहद आश्चर्यचकित होगी। अरे हाँ, तुमको इस बात के लिए ई-मेल किया है कि यहाँ पर इन लोगों ने काफी अच्छी व्यवस्था कर रखी हैं। यहाँ पर सब कुछ है- इंटरनेट से लैस कंप्यूटर भी। कम से कम मुझे यहाँ पर इस फैसिलिटी की तो कतई उम्मीद नहीं थी और एक बात यह भी हें की हमें अपने प्रियजनों को यहाँ से ई-मेल भेजने की इजाज़त भी हैं। में अभी-अभी यहाँ पहुँचा हूँ। यहाँ पर सब कुछ चेक कर लिया हैं। मेने देखा है की तुम्हारे कल के यहाँ आगमन के लिए सारी तैयारियां पूरी कर ली गई है। तुम्हारे आगमन की हार्दिक उम्मीद के साथ, तुम्हारा प्रिय हमदम पति, &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;यह घटना ठीक एक साल पहले घटी थी। उस महिला की मौत अगले दिन हो गई। ई-मेल में लिखी बात किसी और के लिए थी, मगर वह इस विधवा पर लागु है गई थी। फंडा यह है  की आधुनिक वैज्ञानिक युग ने  आदमी की सहूलियत  के लिए बहुत संसाधन दिए हैं- जैसे की कंप्यूटर और इंटरनेट लेकिन इनके साइड इफेक्ट भी हैं, जिनसे हमें सावधान रहना चाहिऐ। उदाहरण के लिए अपने ई-मेल पते पर आये अवांछित संदेशों को सावधानी से देखें की ये आपके लिए है  या नहीं? अगर है , तो  किसी परिचित के हैं या गैर के। गैर के हैं तो  इनका मकसद क्या है , आदि-आदि। उक्त महिला ने बगैर सच्चाई जाने दूसरे के ई-मेल को अपना समझ लिया। जिसका नतीजा उसे भुगतना पड़ा। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-5722695449496718163?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/5722695449496718163'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/5722695449496718163'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/02/blog-post_22.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-1014419717563839215</id><published>2008-02-21T13:41:00.001+05:30</published><updated>2008-02-21T13:46:49.073+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;strong&gt;भुनभुनाना बंद करें&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अपने हालात पर हमेशा रोते-खीजते रहने और इसके लिए दूसरो पर दोष मढ़ने के बजाये अगर खुद अपना भाग्य बदलने के लिए कुछ करें, तो आप अपने प्रतिस्पर्धियों से अधिक तेजी से आगे बढ़ सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;ग्राहकों को अच्छी सर्विस देना आपके हाथ है, क्योंकि अच्छी सर्विस आपके अंतःकरण पर निर्भर करती है। वर्षों पहले में न्यूयौर्क(अमेरिका) में जे ऍफ़ के एअरपोर्ट पेर टैक्सी की प्रतीक्षा कर रहा था। थोडी देर बादएक टैक्सी आकर मेरे सामने रुकी, उसमे जो बात मेंने सबसे पहले नोटिस की वह यह की टैक्सी बिलकुल चकाचक और साफ सुथरी थी। उसका ड्राईवर काफी बना- ठना ओर स्मार्ट दिख रहा था। उसने अपना परिचय कुछ इस तरह दिया, में वैली यानी आपका ड्राईवर हूँ। मेरी दिली तम्मना है की आप मेरी टैक्सी सर्विस केमिशन के बरे में पड़ लें। यह कहते हुए उसने एक कार्ड मेरी तरफ बढाया, उसमे लिखा था, मेरा मिशन अपने ग्राहकों को दोस्ताना माहौल में जल्दी-से-जल्दी, सुरक्षित और कम-से-कम कीमत पर उनकी मंजिल तक पहुँचाना है। इन पंक्तियों को पड़कर में तो भौंचक्का रह गया। मुझे इस बात ने भी अपनी और आकर्षित किया की टैक्सी के अन्दर और बाहर की चमक एक समान थी। अपनी टैक्सी की सटैरिंग सँभालते हुए वैली ने मुझसे पूछा, आप काँफी लेना पसंद करेंगे? मेरे पास थर्मस में है। मैंने फिर मजाक के अंदाज़ में कहा, नहीं, में सॉफ्ट ड्रिंक लेना पसंद करता हूँ। मनो मेरे नहले पर दहला मरते हुए वैली मुस्कराया, नो प्रॉब्लम मेरे पास कूलर है जिसमे रेगुलर और डाइट कोक, जल और ऑरेंज जूस है।आखिरकार फिर मेंने लड़खड़ाती जुबान में डाइट कोक लेने की इक्षा जताई। इसके बाद वैली ने एक कदम और आगे बड़ते हुए पूछा, अगर आप कुछ पड़ना चाहते हैं तो मेरे पास वाल स्ट्रीट जर्नल, टाइम, स्पोर्ट्स इलेस्टरेट्ड और यू एस टुडे है। हम जैसे-जैसे आगे बड़ रहे थे, वैली ने एक ओर दमकता हुआ कार्ड मेरी ओर ये कहते हुए बढाया कि ये वो रेडियो स्टेशन हैं जिनकी सेवाएं मेरे पास हैं, और ये इस तरह का म्युसिक प्रसारित करते हैं। अगर आप रेडियो सुनना चाहते हैं तो बताएं।जैसे लगता था, इतना ही काफी नहीं, वैली ने बताया मेरी टैक्सी वातानुकूलित है ओर आपको कमी वेसी करनी हो तो बताएं। इसके बाद वैली ने मेरी मंजिल के लिए सर्वोत्तम रास्ता बताया। फिर वैली ने कहा की वह मुझसे बात करने में खुसी महसूस करेगा और अगर कोई दर्शनीय स्थल विशेष प्रिय हो तो बताऊँ। अगर में अपने आपमे ही बिज़ी रहना चाहता हूँ तो कोई बात नहीं, रह सकता हूँ। मेंने पूछा वैली क्या मुझे यह बताओगे की क्या अपने ग्राहकों(सवारियों) को हमेशा एसी ही सर्विस देते आये हो ? वैली के होटो पर मुस्कान बिखर गई, वह बोला, नहीं, ऐसी बात तो नहीं है। पिछले दो सालों से ही ऐसा करना शुरू किया है, टैक्सी सर्विस के पांच साल तो मेंने दूसरे टैक्सी मालिकों की तरह हमेशा दुनिया को लानत-मलानत भेजने ओर सिर्फ शिकायतें करने में गवाएँ लेकिनमेंने एक दिन हिनहिनाना-भुन्भुनाना बंद करने का निश्चय किया और अपने आपसे खुश रहने का फैसला किया। इसी का नतीजा है की आज मेरे पास आधा दर्जन टैक्सियाँ हैं।फंडा यह है की अपने हालत पर हमेशा रोते रहने और इसके लिए दूसरो पर दोष मढ़ने के बजाये अगर खुद अपना भाग्य बदलने के लिए कुछ करें तो आप अपने प्रतिस्पर्धियों से अधिक तेजी से आगे बढ़ सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-1014419717563839215?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/1014419717563839215'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/1014419717563839215'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/02/blog-post_21.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-648873821811147287.post-4242713442266169409</id><published>2008-02-19T10:45:00.000+05:30</published><updated>2008-02-19T11:42:02.500+05:30</updated><title type='text'>आज का मेनेजमेंट फंडा</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#336666;"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;नाम की गफलत से बचें&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;कर्मचारियों के एम् जैसे नाम स्टाफ के बीच समस्या पैदा कर सकते हैं। खास मौकों पर कम्पनी के एचआर विभाग को कर्मचारियों के नाम को लेकर गफलत से निपटना चाहिए &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;सेरिडोन टैबलेट बनाने वाली कंपनी रोष प्रोडक्ट लि को एक समय एक विचित्र किस्म की समस्या से दो चार होना पड़ रहा था। इस कंपनी के महाप्रबंधक का नाम डाक्टर काशीनाथ कॉल था। सीरप विभाग में भी इसी से मिलते जुलते नाम वाला एक ओपरेटर, कशी विश्वनाथन था। कॉल एक कश्मीरी थे और कामकाज के मामले में काफी सख्त थे। इसके अलावा निर्माण प्रक्रिया के बरे में वह गहरी जानकारी रखते थे। उन्हें सीरप में महारत हासिल थी। उनके साथ समस्या यह थी की वे जब भी उस विभाग में राउंड लगाने जाते थे, तो दुसरे वर्कर विश्वनाथन को कशी कहकर पुकारने लगते थे, जो डाक्टर कॉल का शुरुआती और संक्षिप्त नाम था। इससे बचने के लिए एचआर विभाग ने सबसे पहले डाक्टर कॉल का नाम बदल दीया। उन्हें तत्काल प्रभाव से डाक्टर के एन कॉल कहकर सम्भोदित किया जाने लगा। वे इसी नाम से कागजों पर हस्ताक्षर करने लगे। सभी वरिष्टों को उन्हें नये नाम से पुकारने के लिए कहा गया। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;हाल ही में में ग्लोबल इन्वेस्टर मीत के दौरान इंदौर में था। वाहन मेरी मुलाकात टाटा टी के अकाउंट मैनेजर कृष्ण अय्यर से हुई। संयोग से अय्यर का नाम टाटा टी के उपद्यक्ष कृष्ण कुमार से मिलता-जुलता हैं। में अय्यर से इस बारे में पूछा के वे इस समानता से पैदा हुई गफलत से कैसे बचते हैं? अय्यर नें बड़ी सता से बताया की हर कोई मुझे अय्यर कहता हैं ओर उपाध्यक्ष को उनके सम्कक्षी कृष्णा कहकर बुलाते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;फंडा यह हैं की खास मौकों पर कम्पनी के एच आर विभाग को कर्मचारियों के नाम को लेकर गफ्लातों से निपटना चाहिऐ। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/648873821811147287-4242713442266169409?l=funda-today.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/4242713442266169409'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/648873821811147287/posts/default/4242713442266169409'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://funda-today.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html' title='आज का मेनेजमेंट फंडा'/><author><name>Hindia</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry></feed>
